मेला गढमुक्तेश्वर का सूक्ष्म इततहास

पति‍त पावनी गंगा के तट पर बसा गढ़मुक्तेश्वर अनादि काल से भगवान शिव की आराधना स्थल रहा है। महाभारत काल से यह नगर हस्तिधनापुर राज्य का प्रमुख केन्द्र माना जाता है। इसे पाण्डवों की सैर गाह भी बताया गया है। तभी से गंगा के तट पर कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर एक विशाल मेला लगता आ रहा है। आज भी परम्परा अनुसार गढ़ मेला दूर दूर तक प्रसिद्ध है। इसी कारण से इसे अर्ध कुम्भ की संज्ञा दी जाती है।
सन् 1904 में अंग्रेजों द्वारा प्रकाशित इम्पीरियल गजेटियर ऑफ इण्डिमया के पृष्ठ 162-163 पर गढ़मुक्तेश्वर के विषय में विवरण दिया गया है, जिसमें अन्य बातों के अतिरिक्त यह दर्शाया गया है कि‍ गढ़मुक्तेश्वर महादेव के महान मंदिर के कारण इसका वर्तमान नाम पड़ा है। इस मंदिर में चार मूर्तियां भी हैं, जिसमें दो मूर्तियां गंगा तट पर तथा दो नीचे की ओर है। इनके निकट ही पवित्र तालाब है, जिसके जल से सभी पापों का क्षय जो जाता है। ऐसी मान्यता है कि (गजेटियर में यह भी विवरण है) इस स्थान पर एक प्राचीन दुर्ग है, जिसकी 18वीं सदी में एक मराठा सरदार ने मरम्मत कराई थी। हर साल कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर यहं एक प्रमुख मेला जुड़ता है, जिसमे 20 लाख से भी अधिक सरणार्थी धर्म लाभ हेतु आते हैं। बारह और चालीस वर्षों के अन्तराल पर इसमें तीर्थ यात्रि‍यों की संख्या और अधिक हो जाती है। यह विवरण भी है कि इस मेले पर होने वाला खर्च गाड़ियों और पशुओं आदि पर शुल्क लगाकर एवं दुकानों के किराये पर निकलता है। पहले इस मेले में बिक्री हेतु घोड़े अधिक मात्रा में प्रदर्शि‍त किये जाते थे, परन्तु अब कुछ समय से इसका प्रदर्शन कम हो रहा है। इनके स्थान पर खच्चर अधिक मात्रा में लाये जाते हैं।
उक्त एतिहासिक पृष्ठभूमि एवं गजेटियर के विवरण के आधार पर मेले की प्राचीनता एवं निरंतरता का आभास होता है। जिला पंचायत का इस मेले से वस्तुतः 1922 में जिला बोर्ड अधिनियम के प्रभावी होने के उपरान्त हुआ। इस मेले की व्यवस्था तत्कालीन जिला बोर्ड मेरठ के हाथों में आयी। इसके उपरांत जिला पंचायत मेरठ व वर्ष 1979 से जिला पंचायत गाजि़याबाद के अधीन इस मेले का आयोजन किया जा रहा है। यह एक वार्षिक मेला है, जो कुम्भ के उपरान्त गंगा नदी के तट पर लगने वाले वार्षिक मेलों में सबसे बड़ा है। इस मेले का स्वरूप आज भी वही है, कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर 20 लाख से भी अधिक श्रृद्धालु पतित गंगा में स्नान करके अपने को धन्य मानते हैं। मेला के मुख्य स्थल से पश्चिआम दक्षिण में मेला गधा खच्चर भी लगया जाता है, इसमें घोड़े खच्चर एवं गधों की खरीद फरोख्त होती है। इस प्रकार यह उत्तर भारत के ग्रामीण क्षेत्र की सांस्कृतिक, धार्मिक एवं सूक्ष्म स्तर पर व्यावसायिक धरोहर है।