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इतिहास

हापुड़ जनपद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के नवीनतम जनपदों में से एक है, किन्तु इस क्षेत्र का इतिहास अत्यंत प्राचीन एवं समृद्ध रहा है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में स्थित हापुड़ ऐतिहासिक रूप से कृषि, व्यापार तथा परिवहन का एक महत्वपूर्ण केन्द्र रहा है।

प्राचीन इतिहास

प्राचीन काल में हापुड़ को हरिपुर के नाम से जाना जाता था। स्थानीय परंपराओं के अनुसार, यह स्थान भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ा हुआ है। माना जाता है कि मथुरा से हस्तिनापुर की यात्रा के दौरान भगवान श्रीकृष्ण ने यहाँ विश्राम किया था।

एक अन्य स्थानीय परंपरा के अनुसार, हापुड़ की स्थापना लगभग 983 ईस्वी में दोर राजपूत शासक हरदत्त द्वारा की गई थी। कुछ लोककथाएँ इसकी स्थापना का श्रेय राजा हरिश्चंद्र को भी देती हैं। यद्यपि ये कथाएँ स्थानीय सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, किन्तु इनके समर्थन में पर्याप्त ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।

मध्यकालीन इतिहास

मुगल शासन के दौरान हापुड़ एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक एवं व्यापारिक केन्द्र के रूप में विकसित हुआ। यह नगर विशेष रूप से अनाज, गुड़ तथा पशुधन के व्यापार के लिए प्रसिद्ध था। इसी काल में हापुड़ का आर्थिक महत्व बढ़ा और यह क्षेत्र एक प्रमुख मंडी के रूप में स्थापित हुआ।

सत्रहवीं शताब्दी में मुगल सम्राट औरंगज़ेब के शासनकाल के दौरान निर्मित जामा मस्जिद सहित अनेक ऐतिहासिक इमारतें इस काल की स्थापत्य एवं सांस्कृतिक विरासत का प्रमाण हैं।

ब्रिटिश काल

ब्रिटिश शासन के समय हापुड़ उत्तर भारत की सबसे बड़ी अनाज एवं गुड़ मंडियों में से एक बन गया। सड़कों और रेलवे लाइनों के निर्माण से दिल्ली, मेरठ तथा अन्य प्रमुख नगरों के साथ व्यापारिक संपर्क में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।

इस अवधि में कृषि स्थानीय अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार बनी रही। गेहूँ, गन्ना तथा अन्य कृषि फसलें इस क्षेत्र की प्रमुख उपज थीं।

हापुड़ जनपद का गठन

वर्ष 2011 तक वर्तमान हापुड़ क्षेत्र गाजियाबाद जनपद का हिस्सा था। प्रशासनिक सुविधा एवं बेहतर शासन व्यवस्था के उद्देश्य से 28 सितंबर 2011 को उत्तर प्रदेश सरकार ने हापुड़, धौलाना तथा गढ़मुक्तेश्वर तहसीलों को मिलाकर पंचशील नगर नामक नए जनपद का गठन किया।

बाद में 23 जुलाई 2012 को इस जनपद का आधिकारिक नाम बदलकर हापुड़ जनपद कर दिया गया।

आधुनिक हापुड़

वर्तमान में हापुड़ राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) का एक महत्वपूर्ण जनपद है। यह दिल्ली से लगभग 60 किलोमीटर पूर्व स्थित है।

हापुड़ एक प्रमुख औद्योगिक एवं व्यापारिक केन्द्र के रूप में विकसित हो चुका है। यहाँ स्टेनलेस स्टील पाइप एवं ट्यूब, पेपर कोन, पापड़ निर्माण तथा पिलखुवा के वस्त्र उद्योग विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।

राष्ट्रीय राजमार्ग-9 तथा प्रमुख रेलवे मार्गों से उत्कृष्ट संपर्क होने के कारण हापुड़ का औद्योगिक एवं आर्थिक महत्व निरंतर बढ़ रहा है।

ऐतिहासिक समयरेखा

वर्ष/काल प्रमुख घटना
प्राचीन काल क्षेत्र हरिपुर के नाम से प्रसिद्ध तथा भगवान श्रीकृष्ण से संबंधित स्थानीय परंपराएँ
मुगल काल महत्वपूर्ण प्रशासनिक एवं व्यापारिक केन्द्र के रूप में विकास
ब्रिटिश काल उत्तर भारत की प्रमुख अनाज एवं गुड़ मंडी के रूप में उभरना
28 सितंबर 2011 पंचशील नगर जनपद का गठन
23 जुलाई 2012 जनपद का नाम बदलकर हापुड़ जनपद किया गया

निष्कर्ष

हापुड़ का इतिहास एक प्राचीन बस्ती से आधुनिक औद्योगिक एवं व्यापारिक जनपद तक की विकास यात्रा को दर्शाता है। इसकी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक विरासत इसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के महत्वपूर्ण जनपदों में स्थान दिलाती है। यद्यपि एक पृथक जनपद के रूप में इसकी स्थापना हाल के वर्षों में हुई है, फिर भी इसका ऐतिहासिक महत्व प्राचीन काल से ही बना हुआ है। निकटवर्ती गढ़मुक्तेश्वर एवं हस्तिनापुर जैसे ऐतिहासिक स्थलों से इसका गहरा संबंध इसकी सांस्कृतिक पहचान को और अधिक समृद्ध बनाता है।